उत्तर प्रदेशवाराणसी

आईआईवीआर के शोध कार्यक्रमों से पूर्वोत्तर राज्यों को मिल रहा लाभ

Shekhar Pandey

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वाराणसी। प्रेस सूचना ब्यूरो (पीआईबी) अगरतला की पहल पर त्रिपुरा के पत्रकारों का एक दल वाराणसी भ्रमण के दौरान बुधवार को भारतीय सब्जी अनुसंधान संस्थान (आईआईवीआर) पहुँचा। इस दौरान पत्रकारों ने संस्थान के निदेशक डॉ. राजेश कुमार से संवाद कर सब्जी उत्पादन से जुड़े अनुसंधान और तकनीकी प्रसार की जानकारी प्राप्त की। पत्रकार दल का नेतृत्व पीआईबी (उत्तर-पूर्व) के अतिरिक्त महानिदेशक कृपाशंकर यादव ने किया।

संस्थान के निदेशक डॉ. राजेश कुमार ने बताया कि उत्तर-पूर्वी पर्वतीय क्षेत्र, विशेषकर त्रिपुरा में सब्जी उत्पादन की अपार संभावनाएँ हैं। उन्होंने कहा कि यह क्षेत्र पोषण सुरक्षा, किसानों की आय बढ़ाने और रोजगार सृजन के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। अनुकूल जलवायु और विविध कृषि परिस्थितियों के कारण यहां विभिन्न प्रकार की सब्जियों की खेती सफलतापूर्वक की जा सकती है।

उन्होंने कहा कि उन्नत किस्मों, जलवायु-सहिष्णु तकनीकों और बेहतर उत्पादन प्रबंधन को अपनाकर पूर्वोत्तर राज्यों में सब्जी उत्पादन को उल्लेखनीय रूप से बढ़ाया जा सकता है। भारतीय सब्जी अनुसंधान संस्थान द्वारा इस क्षेत्र के लिए उपयुक्त सब्जी किस्मों के विकास, उत्पादन तकनीकों के प्रसार तथा किसानों और हितधारकों के प्रशिक्षण के लिए निरंतर प्रयास किए जा रहे हैं।

एनईएच क्षेत्र में अनुसंधान एवं विकास गतिविधियों के प्रभारी डॉ. राकेश कुमार दुबे ने प्रस्तुतीकरण के माध्यम से संस्थान की किसानोपयोगी गतिविधियों और तकनीकी उपलब्धियों की जानकारी दी।

भ्रमण के दौरान पत्रकारों ने संस्थान के वैज्ञानिकों से संवाद कर त्रिपुरा में सब्जी उत्पादन की वर्तमान स्थिति, किसानों की चुनौतियों और संस्थान की भूमिका से जुड़े कई प्रश्न पूछे।

पत्रकार दल ने संस्थान के अनुसंधान फार्म, हाई-टेक नर्सरी और ब्रिमेटो तथा पोमेटो जैसी प्रायोगिक फसलों का भी अवलोकन किया। इन नवाचारों में पत्रकारों ने विशेष रुचि दिखाई और वैज्ञानिकों से इनके संभावित उपयोग और भविष्य की संभावनाओं के बारे में जानकारी प्राप्त की।

इस अवसर पर संस्थान के विभिन्न विभागाध्यक्षों में डॉ. ए.एन. सिंह, डॉ. अनंत बहादुर, पीएमई के अध्यक्ष डॉ. एस.के. सिंह सहित अन्य वैज्ञानिक भी उपस्थित रहे।

कार्यक्रम का आयोजन संस्थान के मीडिया सेल द्वारा डॉ. डी.पी. सिंह के माध्यम से किया गया, जबकि कार्यक्रम के संचालन में डॉ. राकेश दुबे और डॉ. इंदिवर प्रसाद का विशेष सहयोग रहा।

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