उत्तर प्रदेशवाराणसी

Varanasi : पंचांग की उपयोगिता पर शास्त्रार्थ महाविद्यालय में पंच दिवसीय प्रशिक्षण कार्यशाला सम्पन्न

Shekhar pandey

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वाराणसी। विगत वर्षों से काशी ही नहीं अपितु देश के कई हिस्सों में सनातन धर्म के प्रमुख तीज-त्यौहारों की तिथि व मुहूर्त के निर्णय पर अनेक प्रकार की विषमताएं सामने आने लगती हैं। ऐसे में इसका निर्णय करना कठिन हो जाता है। किन्तु प्राय: इन दुविधाओं के समाधान हेतु लोग काशी के विद्वानों की ओर देखते हैं और उनके निर्णय को ही सर्वमान्य लेते हैं। इसी को देखते हुए शास्त्रार्थ महाविद्यालय ने पंचांग की उपयोगिता व इसके महत्व को जन-जन तक सरलता से पहुँचाने का बीड़ाउठाया। डॉ गणेश दत्त सोमवार को पंच दिवसीय पंचांग प्रशिक्षण कार्यशाला के समापन कार्यक्रम में अध्यक्षता कर रहे शास्त्रार्थ महाविद्यालय के राष्ट्रपति पुरस्कृत पूर्व प्राचार्य डॉ गणेश दत्त शास्त्री ने कहा कि अंग्रेजी कैलेंडर के पूर्व लोग पंचांग के माध्यम से ही दिशा-शूल व व्रत आदि के नियमों का पालन करते थें। किन्तु आज मोबाईल के माध्यम से इसकी उपयोगिता घटती जा रही है जो चिंतनीय है। आवश्यकता है कि प्रकार के आयोजन के माध्यम से छात्रों को ही नहीं अपितु समाज के लोगों को भी जोड़ा जायेगा।

डॉ देवदूत कोलकाता से आए ज्योतिष व तंत्र के साधक ने कहा कि इसमें भिन्नता के कई कारण हो सकते हैं। जैसे अलग-अलग पंचांगों का उपयोग, सूर्योदय-सूर्यास्त का महत्व और संप्रदायों के बीच मतभेद भी है। इन कारणों से एक ही त्योहार अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग तिथियों पर पड़ सकता है। अत: इसे दूर कर हम अपने अनुष्ठान रूपी फेस्टिवल को सह्रदयता से मानसिक व मैत्रीपूर्ण वातावरण में सोल्लास के साथ मना सकते हैं। इस पंच दिवसीय कार्यशाला में प्रशिक्षण दे रहे आचार्य संजय उपाध्याय ने बोला कि अधिकांश भारतीय त्योहार चंद्र कैलेंडर के अनुसार मनाए जाते हैं,जो चंद्रमा की गति पर आधारित होता है।अलग-अलग क्षेत्रों में भिन्न-भिन्न पंचांगों का उपयोग होता है,जिसके कारण तिथियों में थोड़ा अंतर हो सकता है। प्राय: मन में भ्रान्तियाँ उत्तपन्न होने से लोग कुछ त्योहारों के लिए ‘उदया तिथि’ (जिस दिन सूर्योदय होता है) के अनुसार मनाते हैं। जिससे तारीखें बदल सकती हैं। इसके अलावा अतिरिक्त माह: हर तीन साल में हिंदू कैलेंडर में एक अतिरिक्त महीना (अधिक मास या मल मास) जोड़ा जाता है,जो त्योहारों की तारीखों को प्रभावित करती हैं।

विशिष्ट वक्ता के रूप में टीकमाणी संस्कृत कॉलेज के ज्योतिष विभागाध्यक्ष डॉ अमोद दत्त शास्त्री ने बतलाया कि पंचांग के पाँच मुख्य अंग (तिथि, वार, नक्षत्र, योग, करण) पर्वों और शुभ-अशुभ समय की गणना करते हैं,जिससे सही तारीख और समय का पता चलता है। पंचांग सूर्य और चंद्रमा की चाल के आधार पर काम करता है, जिसके कारण त्योहारों की तारीखें ग्रेगोरियन कैलेंडर के अनुसार हर साल बदलती रहती हैं। तिथि, वार, नक्षत्र, योग और करण: ये पंचांग के पांच महत्वपूर्ण अंग हैं जो किसी भी पर्व या धार्मिक अनुष्ठान के लिए सबसे सटीक और शुभ समय निर्धारित करते हैं। दीपावली जैसे त्योहार चंद्रमा के आधार पर अक्टूबर या नवंबर में आते हैं, जबकि मकर संक्रांति जैसे त्योहार सूर्य के राशि परिवर्तन के अनुसार एक निश्चित तिथि पर पड़ते हैं।कार्यक्रम संयोजक संस्था के प्राचार्य डॉ पवन कुमार शुक्ला ने संचालन करते हुए कहा कि सटीक जानकारी के लिए पंचांग का उपयोग आवश्यक है।

पंचांग या हिंदू कैलेंडर का उपयोग करके आप किसी भी त्योहार की सटीक तिथि और शुभ समय जान सकते हैं। इसके गणना में ज्योतिषीय ज्ञान का उपयोग होता है,जो त्योहारों के महत्व और सही समय को समझने में मदद करता है। दीपवाली के बाद पुनः एक बड़ा आयोजन महाविद्यालय द्वारा किया जाएगा जिसमें आम जनमानस में इसकी उपयोगिताओं को समझाने का भागीरथ प्रयास किया जाएगा। साथ ही प्रयास होगा कि निःशुल्क पंचांग का वितरण भी हो सके जिससे लोगों में इसके प्रति रूचि बढ़ जाए। समापन समारोह मे प्रमुख रूप से डॉ सारनाथ पाण्डेय, डॉ विनोद राव पाठक, डॉ संकठा देव पाण्डेय, विशाल शास्त्री आदि विद्वानों ने भी अपने विचार रखे।

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