Varanasi: श्री गुरु पूर्णिमा महोत्सव के अवसर पर पूज्य मां श्री सर्वेश्वरी सेवा संघ प्रांगण में रंगारंग कार्यक्रम की प्रस्तुति

Shekhar pandey
वाराणसी, निष्पक्ष काशी । गुरु पूर्णिमा महोत्सव हर वर्ष की भांति इस वर्ष भी पूज्य माँ श्री सर्वेश्वरी सेवा संघ, जलीलपुर, पड़ाव के प्रांगण में बड़े धूमधाम से मनाया गया। आज प्रातः5 बजे से श्रमदान, कलश यात्रा, ध्वजारोहण, गंगा स्नान के उपरांत कलश यात्रा निकाली गई जो “अघोरान्ना परो मंत्र: नास्ति तत्त्वं गुरो:परम्” का जाप करते हुए परम पूज्य श्री अघोरेश्वर महाप्रभु के चरण पादुका तक पहुचकर सम्पन्न हुई। इसके बाद परम पूज्य श्री अघोरेश्वर महाप्रभु के शिष्य पूज्य श्री गुरु बाबा जी और बाबा श्री अनिल रामजी के द्वारा हवन- पूजन किया गया जिसके उपरांत ध्वजा पूजन और गुरु दर्शन का कार्यक्रम चलता रहा। विभिन्न स्थानों से आये श्रद्धालुओं ने गुरु चरणों मे श्रद्धा सुमन अर्पित कर उनका आशीष प्राप्त किया। दिन में विशाल भंडारे का कार्यक्रम चलता रहा और सांयकाल अघोरेश्वर गुरुकुल के बच्चों ने सांस्कृतिक एवं रंगारंग कार्यक्रम की प्रस्तुति दी।इस अवसर पर सांयकाल विचार-गोश्ठी में श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए पूज्य श्री गुरु बाबाजी ने अपने आशीर्वचन में कहा कि अघोर संप्रदाय में गुरु पूर्णिमा वर्ष का मुख्य उत्सव है।

अघोरी अपने ज्ञान का स्रोत अपने गुरु के वचनों को मानते हैं, न कि किसी पुस्तक, शास्त्र या किसी अन्य प्रकार की आध्यात्मिक चर्चा को। अघोर गुरुओं की शिक्षाएं उस समय – काल और स्थान के अनुसार होती हैं जिस समय – काल एवं स्थान में वे रहते हैं। पवित्र ग्रंथों और शास्त्रों में भले ही अच्छे विचार और आस्थाएँ संप्रेषित की गई हों, पर वे मानव जाति और उस समय की संस्कृति के अनुसार लिखे गए थे, जो कि आज से बहुत पहले की बात है और कभी कभी काफी पहले के समय-काल में कही गई थी।आज का मानव और उसकी परिस्थितियां उस समय के से बहुत भिन्न है जब वे ग्रंथ लिखे गए थे। यद्यपि आज भी बहुत सी बातें स्वीकार्य हो सकती हैं, परंतु ऐसी भी कुछ हो सकता हैं कि आज का मानव उनमें से बहुत सी बातो कोअस्वीकार कर दे।
इसी कारण से हम अघोर संप्रदाय में अपने समय-काल के गुरु के वचनों को अधिक महत्व देते हैं। अघोर साधना का मूल तत्व बहुत प्राचीन है, लेकिन इसकी शिक्षाएं समय के अनुसार ढलती रही हैं, जिससे इसका मूल तत्व तो अक्षुण्ण रहता है, परंतु उसका प्रसारण युग और परिस्थिति के अनुसार होता है। पवित्र ग्रंथों को पढ़ना और जानना हमें कुछ प्रेरणा तो दे सकती है, लेकिन वह हमें ईश्वर का अनुभव नहीं करा सकती। यह अनुभव हम प्राप्त कर सकते हैं केवल अपने भीतर के विकास और गुरु तथा कपालेश्वर की कृपा प्राप्ति से। हम अघोर साधना और गुरु द्वारा प्रदान किए गये मंत्र से ही ईश्वर से जुड़ने का अवसर प्राप्त कर सकते हैं। गहरी श्रद्धा और दैनिक साधना के माध्यम से हम यह अनुभव कर सकते हैं कि गुरु तो सदा से हमारे भीतर ही उपस्थित रहे हैं और वही उपस्थिति ही हमारे भीतर ईश्वर की उपस्थिति की खोज है। इसलिए सत्य की खोज में लगे साधक के लिए इन तथ्यों की अनुभूति उसे शाश्वत ज्ञान की ओर ले जाती है। इस अवसर पर मुख्य रूप से डॉ. हर्ष वर्धन सिंह, डॉ आर के सिंह (पूर्व सदस्य, भारतीय डाक सेवा) डॉ. आर के सिंह, डॉ पी के सिंह, अधिवक्ता बी एन सिंह, डॉ अशोक मिश्र, ओम प्रकाश सिंह, डॉ. राजेश चौहान, सुनीता चौहान, एवं अघोरेश्वर गुरुकुल के बच्चे एवं शिक्षक गण उपस्थित रहे ।



