उत्तर प्रदेशवाराणसी

Varanasi : सनातन धर्म एवं संस्कृति में चातुर्मास व्रत का विशेष महत्व : शंकराचार्य नरेन्द्रानन्द

Shekhar pandey

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वाराणसी। काशी सुमेरू पीठाधीश्वर जगद्‌गुरू शंकराचार्य स्वामी नरेन्द्रानन्द सरस्वती ने चातुर्मास व्रत के बारे में बताया कि चातुर्मास का सनातन धर्म एवं संस्कृति में विशेष महत्व है। चातुर्मास काल में सन्यासी एक स्थान पर रहकर जप-तप करते हैं, जिससे समाज का चतुर्दिक विकास होता है। चातुर्मास व्रत आषाढ़ पूर्णिमा को शुरू होता है एवं इसका समापन भाद्रपद पूर्णिमा को होता है। शंकराचार्य ने कहा कि पूर्व में चातुर्मास व्रत चार महीने तक चलता था जो आषाढ़ एकादशी शुक्ल पक्ष को शुरू होता था एवं कार्तिक शुक्ल पक्ष एकादशी को समाप्त होता था। कालान्तर में इसमें संशोधन हुआ ज्योतिष गणना के अनुसार एक पक्ष को ही एक माह का काल मान लिया गया। इस प्रकार चार पक्ष को चार माह मान लिया गया। अब यह आषाढ़ पूर्णिमा से भादपद्र पूर्णिमा तक होता है।

इस दौरान सन्यासियों को नदियों के पार जाना, क्षौर कर्म, नख काटना आदि वर्जित है। वे प्रस्थान त्रयी का अध्ययन करते हुए ईश्वर की आराधना करते हैं। उन्होंने कहा कि चातुर्मास व्रत के दौरान साधु-सन्तों की यात्रा स्थगित होने से विधर्मियों को धर्मांतरण आदि सनातन विरोधी कार्य करने की छूट मिल जाती थी‌, इसे रोकने के लिए ही चातुर्मास की समयावधि कम की गयी। आज चातुर्मास व्रत के समापन के अवसर पर यज्ञ, सन्त संगोष्ठी एवम् भण्डारा संपन्न हुआ। इसके पश्चात धर्माचार्य सीमोल्लंघन कर धर्म प्रचार एवं अन्य धार्मिक आयोजनों में भाग लेने के लिए मठ-मंदिरों से बाहर निकलेंगे।

सनातन संस्कृति में ही धर्माचार्यों के लिए इस प्रकार का विधान है। संगोष्ठी में अन्य सन्तों ने भी अपने विचार ब्यक्त किया । संगोष्ठी का संचालन स्वामी बृजभूषणानन्द सरस्वती ने किया। इस अवसर पर महन्त बाबा अवधबिहारी दास, महन्त स्वामी प्रकाश आश्रम, स्वामी महादेव आश्रम, स्वामी बालेश्वरानन्द तीर्थ, स्वामी मुनीश आश्रम, स्वामी रणछोड़ आश्रम, विजयराम दास, महन्त मोहन दास सहित सैकड़ों साधु-सन्यासी, भक्त एवम् शिष्य उपस्थित थे।

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