नवरात्र : काशी में शैलपुत्री और मुखनिर्मालिका गौरी के दर्शन का विधान

Shekhar pandey
वाराणसी। चैत्र नवरात्र के पहले दिन काशी में श्रद्धालुओं ने शक्ति की उपासना के तहत देवी शैलपुत्री और मुखनिर्मालिका गौरी के दर्शन-पूजन किए। मान्यता है कि इन दोनों स्वरूपों के दर्शन से भक्तों के जीवन में निर्मलता और शक्ति का संचार होता है।
पौराणिक मान्यता के अनुसार सती ने अपने पिता दक्ष प्रजापति के यज्ञ में अपमानित होकर यज्ञाग्नि में आत्मदाह कर लिया था। इसके बाद भगवान शिव ने यज्ञ को विध्वंस कर दिया। अगले जन्म में सती ने शैलराज हिमालय के घर जन्म लिया और शैलपुत्री कहलायीं। शास्त्रों में नवरात्र की प्रथम देवी शैलपुत्री को शक्ति का आधार माना गया है।
काशी खंड के अनुसार शैलपुत्री का स्थान मढिया घाट पर बताया गया है, जबकि वर्तमान में देवी का प्राचीन मंदिर अलईपुर क्षेत्र में स्थित है। मंदिर तक पहुंचने के लिए कज्जाकपुरा रेलवे क्रॉसिंग से सारनाथ मार्ग पर लगभग एक किलोमीटर आगे, पुराने पुल से पहले गली में जाना पड़ता है। नवरात्र के पहले दिन यहां भक्तों की भीड़ उमड़ती है।
इसी प्रकार, वासंतिक नवरात्र के पहले दिन मुखनिर्मालिका गौरी के दर्शन का भी विधान है। देवी का विग्रह गायघाट स्थित हनुमान मंदिर परिसर में प्रतिष्ठित है। स्थानीय मान्यता है कि देवी के निर्मल मुख के दर्शन से जीवन में शुद्धता और सात्विकता का भाव उत्पन्न होता है। श्रद्धालु इस दिन शैलपुत्री और मुखनिर्मालिका दोनों के दर्शन कर नवरात्र की शुरुआत करते हैं।



