शंकराचार्य जयंती पर काशी सुमेरु पीठ में वैदिक अनुष्ठान, धर्म रक्षा का संकल्प

Shekhar pandey
वाराणसी। अस्सी क्षेत्र स्थित डुमरांव बाग कॉलोनी के आदि शंकराचार्य महासंस्थानम् श्री काशी सुमेरु पीठ मठ में जगद्गुरु शंकराचार्य नरेंद्रानंद सरस्वती जी महाराज के सानिध्य में शंकराचार्य जयंती के पावन अवसर पर धार्मिक अनुष्ठानों का आयोजन वैदिक विधानों के साथ किया गया।
कार्यक्रम का शुभारंभ प्रातः4 बजे ललिता त्रिपुर सुंदरी सहस्त्रार्चन पुष्प, अक्षत और कुमकुम आदि द्रव्यो से पांच विद्वान ब्राह्मणों द्वारा मंत्रोच्चारण के साथ संपन्न हुआ।
रुद्राभिषेक एवं आदि गुरु शंकराचार्य के प्रतिमा का अभिषेक व दिव्य पूजन के तत्पश्चात दंडी साधुओ को प्रसाद ग्रहण करवा कर दक्षिणा दी गई। इस अवसर पर जगद्गुरु शंकराचार्य नरेंद्रानंद सरस्वती महाराज ने कहा कि आदि शंकराचार्य केवल एक महान संत ही नहीं, बल्कि अद्वैत वेदांत के सर्वोच्च प्रवर्तक एवं भगवान शिव का साक्षात अवतार थे। कम आयु में संपूर्ण भारत का भ्रमण कर सनातन वैदिक धर्म की पुनर्स्थापना कर समाज को आध्यात्मिक दिशा प्रदान की।
वक्ताओं ने बताया कि आदि शंकराचार्य ने मात्र आठ वर्ष की आयु में केरल से यात्रा प्रारंभ कर नर्मदा तट पर गोविंद भागवतपाद से संन्यास ग्रहण कर उन्होंने “अहं ब्रह्मास्मि”, “तत्वमसि”, “प्रज्ञानं ब्रह्म” जैसे महावाक्यों के माध्यम से जीव और ब्रह्म की एकता का संदेश दिया। उनके द्वारा स्थापित अद्वैत दर्शन आज भी मानव जीवन को सत्य और आत्मबोध की ओर प्रेरित करता है। विशेप रुप से इस अवसर पर आगामी वर्ष के शंकराचार्य जयंती के अवसर पर 511 किलोग्राम के स्फटिक शिवलिंग व 111 किलोग्राम के श्रीयंत्र की स्थापना का शंकराचार्य महाराज द्वारा संकल्प लिया गया। कार्यक्रम के अंत में उपस्थित सभी संत एवं श्रद्धालुओं ने धर्म, संस्कृति और वैदिक परंपराओं की रक्षा एवं प्रचार-प्रसार का संकल्प लिया।












