Varanasi : वेदों की अष्टविकृतियाँ मूल स्वरूप की अजेय रक्षक, घनपाठ है शुद्धता का वैज्ञानिक कवच: जगद्गुरु शंकराचार्य

Shekhar Pandey
वाराणसी। भारतीय ज्ञान परंपरा के संरक्षण और वेदों के मूल स्वरूप की शुद्धता को लेकर आयोजित एक महत्वपूर्ण सम्मेलन (घनपाठ विमोचन समारोह) में जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती महाराज ने आज वेदों की अष्टविकृतियों (आठ विशेष पाठ विधियाँ) को वेदों के मूल स्वरूप का अजेय संरक्षक घोषित किया। शंकराचार्य ने अपने संबोधन में कहा कि ये पाठ विधियाँ (जटा, माला, शिखा, रेखा, ध्वज, दण्ड, रथ और घन) केवल कंठस्थ करने की तकनीकें नहीं हैं, बल्कि ये एक अद्वितीय वैज्ञानिक सत्यापन तंत्र हैं, जिन्होंने सहस्राब्दियों तक वैदिक मंत्रों के प्रत्येक अक्षर, स्वर (उदात्त, अनुदात्त, स्वरित) और मात्रा की त्रुटिहीन शुद्धता को सुनिश्चित किया है। विश्व की किसी भी मौखिक परंपरा में ज्ञान को संरक्षित करने के लिए ऐसा जटिल और बहु-स्तरीय तंत्र उपलब्ध नहीं है।अष्टविकृतियाँ एक ऐसा सुरक्षा जाल हैं, जो किसी भी उच्चारण या पाठ संबंधी त्रुटि को तत्काल पकड़ लेती हैं।
विशेषकर ‘घन पाठ’, वैदिक मंत्रों के पदों को जटिल, प्रत्यावर्ती क्रम में व्यवस्थित करता है। यह प्रणाली लगभग एक गणितीय एल्गोरिथम की तरह काम करती है, जहाँ एक भी अक्षर का विस्थापन या परिवर्तन पाठ को तुरंत खंडित कर देगा। हमारी यह परंपरा ही वह कारण है कि यूनोस्को ने भी वैदिक जप की परंपरा को मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत के रूप में मान्यता दी है। यह सिर्फ भारत की नहीं, बल्कि संपूर्ण मानव सभ्यता की धरोहर है। आज जब सूचनाओं को डिजिटल रूप से संरक्षित किया जाता है, तब भी वेदों के संरक्षण की यह मौखिक विधि हमें सिखाती है कि कैसे मानव स्मृति और शुद्ध उच्चारण का समन्वय सबसे स्थायी संरक्षण विधि हो सकता है। शंकराचार्य ने कहा कि हमारा यह दृढ़ मत है कि विकृति पाठ ही वह अक्षय कवच है, जिसने वेदों को आक्रमणों, विस्मरण और समय के थपेड़ों से बचाए रखा है। ज्ञातव्य है कि इस ग्रन्थ का प्रकाशन ज्योतिर्मठ बदरिकाश्रम हिमालय के प्रकाशन सेवालय की ओर से हुआ है और डॉ मणि कुमार झा के अथक परिश्रम का परिणाम है जिन्होंने घनपाठ को लिखा और वे स्वयं भी एक ख्यातिलब्ध घनपाठी हैं। मीडिया प्रभारी संजय पाण्डेय ने बताया कि डॉ मणिकुमार झा के अगुवाई में घनपाठीयों ने वैदिक मंत्रोच्चार के मध्य शंकराचार्य महाराज के चरण पादुका पूजन किया।
कार्यक्रम के आरंभ में चारों वेदों के विद्वानों ने चतुर्वेद पारायण किया, जिसके अनंतर विद्वानों का बसंत पूजन भी हुआ। कार्यक्रम का संचालन वैदिक विद्वान श्री पांडुरंगा पुराणिक ने किया। कार्यक्रम में प्रो हृदयरंजन शर्मा, प्रो किशोर मिश्र, प्रो राममूर्ति चतुर्वेदी, प्रो पतंजलि मिश्र, प्रो महेंद्र पाण्डेय, प्रो सुनील कात्यान, प्रो कमलेश झा, रामचंद्र देव, भालचंद्र बादल, जयकृष्ण दीक्षित, नारायण उपाध्याय, अरुण दीक्षित, वी चंद्रशेखर द्रविड़, वीरेश्वर दातार, नारायण घनपाठी, गोपाल रटाटे, बालेंदुनाथ मिश्रा, श्रीनिवास पुराणिक, साध्वी पूर्णांबा दीदी, ब्रम्हचारी परमात्मानंद, अवध राम पाण्डेय, दीपेश दुबे, डॉ गिरीश चंद्र तिवारी, कीर्ति हजारी शुक्ला, यतीन्द्र चतुर्वेदी, अभय शंकर तिवारी सहित भारी संख्या में काशीवासी उपस्थित थे।



