आंतरिक स्वतंत्रता और ब्रह्मज्ञान के संदेश संग मुक्ति पर्व का भव्य आयोजन ,मन के बंधनों से आजादी ही वास्तविक मुक्ति

Shekhar pandey
वाराणसी, 17 अगस्त । संपूर्ण भारतवर्ष जहाँ स्वतंत्रता दिवस को राष्ट्रभक्ति, गौरव और उल्लास के साथ मना रहा था, वहीं संत निरंकारी मिशन ने इस ऐतिहासिक अवसर पर ब्रह्मज्ञान द्वारा प्रदत्त आंतरिक स्वतंत्रता के दिव्य संदेश को भी जन-जन तक पहुँचाया। यह पर्व इस सत्य को साकार करता है कि वास्तविक मुक्ति बाहरी बंधनों से नहीं, बल्कि अज्ञान, अहंकार और भेदभाव से मुक्त होकर आत्मबोध एवं परमात्मबोध की अनुभूति में निहित है। मुक्ति पर्व का यह पावन अवसर परम श्रद्धेय सतगुरु माता सुदीक्षा जी महाराज एवं निरंकारी राजपिता रमित जी के पावन सान्निध्य में दिल्ली स्थित निरंकारी सरोवर के समक्ष, ग्राउंड नं. 2, निरंकारी चौक, बुराड़ी रोड पर श्रद्धा, भक्ति एवं उल्लासपूर्ण वातावरण में आयोजित हुआ।वाराणसी में मलदहिया सत्संग भवन पर भी विशेष सत्संग का आयोजन हुआ। सत्संग को आदरणीय संतोष सिंह ज्ञान प्रचारक जी ने सम्बोधित किया। इस आयोजन में श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए सतगुरु माता सुदीक्षा जी महाराज ने फरमाया कि सच्ची मुक्ति बाहरी बंधनों से नहीं, बल्कि नफरत, अहंकार, छोटी सोच और पूर्वाग्रहों से मुक्त होने में है। हर सांस में निराकार का एहसास रखते हुए प्रेम, भक्ति और स्वीकार्यता से जीना ही जीते-जी मुक्ति है। सतगुरु माता जी ने माता सविंदर जी के जीवन से प्रेरणा देते हुए लाइट हाउस का उदाहरण दिया कि परिस्थितियां कैसी भी हों, भीतर की शांति, प्रेम और सकारात्मकता की रोशनी सदैव कायम रखें। संतों की शिक्षाओं को केवल सुनना नहीं, बल्कि विचार, कर्म और जीवन में उतारना ही वास्तविक साधना और मुक्ति का मार्ग है। इस पावन अवसर पर श्रद्धालु भक्तों ने उन महान संत विभूतियों को श्रद्धापूर्वक नमन करते हुए श्रद्धा-सुमन अर्पित किए, जिनके त्याग एवं समर्पण ने मानवता को मुक्ति मार्ग की ओर अग्रसर किया। निसंदेह मुक्ति पर्व का मूल भाव यही है कि जैसे भौतिक स्वतंत्रता राष्ट्र की प्रगति और उन्नति का मार्ग प्रशस्त करती है, वैसे ही ब्रह्मज्ञान की दिव्य ज्योति मानव को अपनी वास्तविक पहचान का बोध कराते हुए प्रेम एवं सद्भाव के पावन मार्ग पर अग्रसर होने की प्रेरणा प्रदान करती है।







