अंतिम छोर तक स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाने में होम्योपैथी की बढ़ती भूमिका

Shekhar Pandey
नई दिल्ली। देश में समावेशी और सुलभ स्वास्थ्य व्यवस्था को मजबूत करने की दिशा में होम्योपैथी एक महत्वपूर्ण विकल्प के रूप में उभर रही है। विशेष रूप से ग्रामीण, जनजातीय और दूरदराज क्षेत्रों में यह पद्धति स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच बढ़ाने में अहम भूमिका निभा रही है।
हर वर्ष 10 अप्रैल को मनाए जाने वाले विश्व होम्योपैथी दिवस के अवसर पर इस वर्ष की थीम “सतत स्वास्थ्य के लिए होम्योपैथी” रखी गई है। यह अवसर इस प्रणाली के महत्व और इसके व्यापक प्रभाव को समझने का है।
18वीं शताब्दी में सैमुअल हैनिमैन द्वारा विकसित होम्योपैथी “समान से समान का उपचार” सिद्धांत पर आधारित है। भारत में यह चिकित्सा पद्धति आज स्वास्थ्य प्रणाली का एक अभिन्न हिस्सा बन चुकी है और जमीनी स्तर पर प्रभावी साबित हो रही है।
देश में वर्तमान में 290 से अधिक होम्योपैथिक मेडिकल कॉलेज और अस्पताल संचालित हैं, साथ ही बड़ी संख्या में चिकित्सक कार्यरत हैं। खास बात यह है कि इसकी दवाएं किफायती, सुरक्षित और आसानी से उपलब्ध होती हैं, जिससे यह कमजोर स्वास्थ्य ढांचे वाले क्षेत्रों में भी प्रभावी साबित होती है।
केंद्र सरकार ने भी होम्योपैथी को मुख्यधारा में लाने के लिए कई कदम उठाए हैं। राष्ट्रीय आयुष मिशन के तहत 12,500 से अधिक आयुष्मान आरोग्य मंदिर स्थापित किए गए हैं, जहां प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराई जा रही हैं।
इसके अलावा, केंद्रीय होम्योपैथी अनुसंधान परिषद (सीसीआरएच) द्वारा मधुमेह, हृदय रोग और अन्य गैर-संक्रामक बीमारियों के प्रबंधन में भी होम्योपैथी को शामिल किया गया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि होम्योपैथी की सबसे बड़ी ताकत इसकी सरलता, कम लागत और समुदाय के साथ गहरा जुड़ाव है। यह न केवल रोगों के उपचार में सहायक है, बल्कि सतत और पर्यावरण अनुकूल स्वास्थ्य प्रणाली के निर्माण में भी योगदान दे रही है।
आगे बढ़ते हुए, विशेषज्ञों ने सुझाव दिया है कि कम सुविधा वाले क्षेत्रों में प्रशिक्षण, दवाओं की उपलब्धता और अनुसंधान को और मजबूत किया जाए, ताकि इस प्रणाली का लाभ अधिक से अधिक लोगों तक पहुंच सके।
स्वास्थ्य सेवाओं का वास्तविक उद्देश्य तभी पूरा होगा, जब देश के अंतिम व्यक्ति तक गुणवत्तापूर्ण उपचार पहुंच सके। इस दिशा में होम्योपैथी एक प्रभावी और भरोसेमंद माध्यम बनकर उभर रही है।









