उत्तर प्रदेशवाराणसी

महिला आरक्षण: अब बदलाव को धरातल पर उतारने का समय**

— सुश्री शोभा करंदलाजे

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सार्वजनिक जीवन में महिलाओं की भागीदारी आज भी अपेक्षाकृत सीमित है। एक जनप्रतिनिधि के रूप में अपने अनुभवों के आधार पर यह स्पष्ट होता है कि निर्णय लेने वाली संस्थाओं में महिलाओं की उपस्थिति अभी भी पर्याप्त नहीं है। यही स्थिति महिला आरक्षण की आवश्यकता को और अधिक प्रासंगिक बनाती है।

भारत में लगभग 67 करोड़ महिलाएं हैं, लेकिन संसद में उनकी भागीदारी लंबे समय तक 15 प्रतिशत के आसपास ही सीमित रही है। ऐसे में नारी शक्ति वंदन अधिनियम लोकतंत्र को अधिक समावेशी बनाने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम है। हालांकि, किसी भी कानून की वास्तविक सफलता उसके प्रभावी क्रियान्वयन पर निर्भर करती है। इसके लिए जनगणना और परिसीमन जैसी प्रक्रियाओं को समयबद्ध तरीके से पूरा करना आवश्यक होगा।

अनुभव बताते हैं कि जब महिलाओं को प्रतिनिधित्व मिलता है, तो नीतियों की प्राथमिकताएं बदलती हैं। पंचायती राज संस्थाओं में महिलाओं के आरक्षण के बाद पानी, स्वास्थ्य, शिक्षा और पोषण जैसे मुद्दों पर अधिक ध्यान दिया गया। इससे यह स्पष्ट होता है कि प्रतिनिधित्व केवल संख्या नहीं, बल्कि नीति निर्माण की दिशा भी तय करता है।

अक्सर यह तर्क दिया जाता है कि महिलाओं को अपनी योग्यता के आधार पर आगे बढ़ना चाहिए। लेकिन यह भी सच है कि अवसरों की असमानता ने लंबे समय तक महिलाओं की भागीदारी को सीमित किया है। आरक्षण किसी की योग्यता को कम नहीं करता, बल्कि उन बाधाओं को दूर करता है जो प्रतिभा को उभरने से रोकती हैं।

नीतिगत स्तर पर महिलाओं की उपस्थिति बेहद महत्वपूर्ण है। महिला जनप्रतिनिधि मातृ स्वास्थ्य, लैंगिक समानता और सामाजिक सुरक्षा जैसे मुद्दों को मजबूती से उठाती हैं। संसद और विधानसभाओं में 33 प्रतिशत आरक्षण से ये आवाजें अपवाद नहीं, बल्कि व्यवस्था का स्थायी हिस्सा बन सकेंगी।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी महिलाओं की समान भागीदारी को ‘विकसित भारत’ के लिए आवश्यक बताया है। ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’, ‘उज्ज्वला’ और ‘जन धन’ जैसी योजनाओं में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी इसी दिशा का संकेत है।

अब सबसे बड़ी आवश्यकता इस कानून को शीघ्र लागू करने की है। यह केवल किसी एक दल का मुद्दा नहीं, बल्कि लोकतंत्र को अधिक न्यायपूर्ण और समावेशी बनाने का अवसर है। जनगणना, परिसीमन और आरक्षण की प्रक्रिया को बिना देरी के पूरा करना होगा।

महिला आरक्षण केवल एक कानून नहीं, बल्कि एक सामाजिक परिवर्तन की शुरुआत है। अब समय आ गया है कि इस परिवर्तन को धरातल पर उतारा जाए।

लेखिका केंद्रीय सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम तथा श्रम एवं रोजगार राज्य मंत्री हैं।

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