सोमनाथ : आस्था, संकल्प और पुनर्जागरण की अनंत धारा

Shekhar Pandey
सोमनाथ के 1000 वर्ष : सनातन चेतना, राष्ट्रीय स्वाभिमान और सांस्कृतिक पुनर्जागरण का प्रतीक
नई दिल्ली/सोमनाथ।
भारत की सनातन सांस्कृतिक चेतना का सबसे जीवंत प्रतीक माने जाने वाले सोमनाथ मंदिर ने हजार वर्षों के इतिहास में अनेक आक्रमण, संघर्ष और विध्वंस देखे, लेकिन हर बार वह नई ऊर्जा और आस्था के साथ पुनः स्थापित हुआ। गुजरात के काठियावाड़ क्षेत्र के दक्षिणी तट पर स्थित भगवान शिव के प्रथम ज्योतिर्लिंग सोमनाथ को भारतीय सभ्यता की अमर आत्मा का प्रतीक माना जाता है।
केंद्रीय संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री गजेन्द्र सिंह शेखावत ने सोमनाथ के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि श्रीमद्भगवद्गीता का श्लोक “न हन्यते हन्यमाने शरीरे” सोमनाथ की हजारों वर्षों की यात्रा को चरितार्थ करता है। उन्होंने कहा कि सोमनाथ केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक आत्मशक्ति, राष्ट्रीय स्वाभिमान और सनातन चेतना का जीवंत केंद्र है।
इतिहास के विभिन्न कालखंडों में मंदिरों और धार्मिक संस्थानों को राजनीतिक संघर्षों और आक्रमणों का सामना करना पड़ा। महमूद गजनवी द्वारा सोमनाथ पर किया गया आक्रमण इतिहास की चर्चित घटनाओं में शामिल है, लेकिन इसके बावजूद श्रद्धा और आस्था कभी समाप्त नहीं हुई। चालुक्य शासकों सहित अनेक राजाओं और समाज के सामूहिक प्रयासों से मंदिर का कई बार पुनर्निर्माण किया गया और यह तीर्थ निरंतर आस्था का केंद्र बना रहा।
प्रभास पाटन स्थित सोमनाथ क्षेत्र को प्राचीन काल से महान तीर्थभूमि माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यही वह स्थान है जहां भगवान श्रीकृष्ण के देहत्याग के बाद उनका अंतिम संस्कार हुआ था। यहां तीन पवित्र नदियों का संगम, गोपी तालाब और वैराग्य क्षेत्र जैसे अनेक धार्मिक स्थल मौजूद हैं, जिनका उल्लेख प्राचीन ग्रंथों और ऐतिहासिक अभिलेखों में मिलता है।
स्वतंत्र भारत में सोमनाथ के पुनर्जागरण का आधुनिक अध्याय 12 नवंबर 1947 को आरंभ हुआ, जब देश के प्रथम उपप्रधानमंत्री और गृहमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल ने मंदिर के पुनर्निर्माण का संकल्प लिया। इसके बाद 11 मई 1951 को भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद की उपस्थिति में मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा संपन्न हुई, जिसने पूरे देश में सांस्कृतिक आत्मविश्वास और राष्ट्रीय चेतना को नई शक्ति प्रदान की।
केंद्रीय मंत्री गजेन्द्र सिंह शेखावत ने कहा कि “सोमनाथ स्वाभिमान पर्व 2026-27” भारत की सांस्कृतिक विरासत, आध्यात्मिक परंपरा और राष्ट्रीय एकता को समर्पित एक ऐतिहासिक आयोजन है। इस वर्षभर चलने वाले राष्ट्रीय कार्यक्रम के माध्यम से 1026 में हुए प्रथम दर्ज आक्रमण के 1000 वर्ष तथा स्वतंत्रता के बाद पुनर्निर्मित मंदिर के पुनः उद्घाटन के 75 वर्ष पूर्ण होने का स्मरण किया जा रहा है।
उन्होंने बताया कि 11 मई 2026 तक देशभर में यात्राएं, सांस्कृतिक आयोजन, संवाद, शैक्षिक कार्यक्रम और विभिन्न ज्योतिर्लिंगों व शिवालयों में विशेष कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे।
प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सोमनाथ ट्रस्ट द्वारा मंदिर परिसर के विकास, धरोहर संरक्षण, आधारभूत संरचना और सांस्कृतिक पहलों को नई गति मिली है। पर्यावरण संरक्षण और महिला सशक्तिकरण से जुड़ी योजनाओं के माध्यम से सोमनाथ आधुनिक भारत की समावेशी और सांस्कृतिक सोच का भी प्रतीक बनकर उभरा है।
गजेन्द्र सिंह शेखावत ने कहा कि इक्कीसवीं सदी में आगे बढ़ते भारत के लिए सोमनाथ यह संदेश देता है कि कोई भी सभ्यता तभी मजबूत रहती है जब वह अपनी जड़ों से जुड़ी रहे और समय के साथ स्वयं को आगे बढ़ाती रहे।
उन्होंने कहा कि सोमनाथ की यह हजार वर्षीय विरासत आने वाली पीढ़ियों को सदैव प्रेरित करती रहेगी और भारत की सनातन चेतना को नई ऊर्जा प्रदान करती रहेगी।












