उत्तर प्रदेशवाराणसी

वाराणसी में ‘सृजन’ के अंतर्गत कजरी गायन कार्यशाला का शुभारंभ

Ashutosh pandey

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वाराणसी, 21 जुलाई। उत्तर प्रदेश लोक एवं जनजाति संस्कृति संस्थान, लखनऊ (संस्कृति विभाग, उत्तर प्रदेश) एवं संत अतुलानन्द कॉन्वेंट स्कूल, कोइराजपुर, वाराणसी के संयुक्त तत्वावधान में ‘सृजन’ कार्यक्रम के अंतर्गत आयोजित कजरी गायन कार्यशाला का शुभारंभ मंगलवार को हुआ। कार्यशाला में अंतरराष्ट्रीय लोकगायक एवं प्रशिक्षक राजन तिवारी (राजकुमार तिवारी ‘राजन’) ने प्रतिभागियों को कजरी गायन की परंपरा, सुर, ताल, लय तथा लोक संगीत की बारीकियों का प्रशिक्षण देना प्रारंभ किया। उन्होंने कहा कि कजरी पूर्वांचल की अमूल्य सांस्कृतिक धरोहर है और इसे नई पीढ़ी तक पहुँचाना हम सभी की जिम्मेदारी है।कार्यशाला में बड़ी संख्या में छात्र-छात्राओं एवं लोक संगीत प्रेमियों ने उत्साहपूर्वक सहभागिता की। प्रतिभागियों ने कजरी गायन के व्यावहारिक एवं सैद्धांतिक पहलुओं को सीखने में विशेष रुचि दिखाई। विद्यालय के सचिव श्री राहुल सिंह ने कार्यशाला के शुभारंभ पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए कहा कि ऐसे सांस्कृतिक आयोजन विद्यार्थियों के व्यक्तित्व विकास के साथ-साथ उन्हें अपनी लोक परंपराओं एवं सांस्कृतिक विरासत से जोड़ने का सशक्त माध्यम हैं। उन्होंने प्रशिक्षक राजन तिवारी के प्रयासों की सराहना करते हुए प्रतिभागियों के उज्ज्वल भविष्य की शुभकामनाएँ दीं।
विद्यालय की निदेशक श्रीमती वंदना सिंह ने कहा कि लोक संगीत हमारी सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण आधार है। कजरी जैसी समृद्ध लोकविधा के संरक्षण एवं संवर्धन के लिए इस प्रकार की कार्यशालाएँ अत्यंत प्रेरणादायी हैं। उन्होंने आयोजन की सफलता के लिए सभी प्रतिभागियों एवं आयोजकों को बधाई दी।
विद्यालय की प्राचार्या डॉ. नीलम सिंह ने कहा कि विद्यार्थियों में भारतीय लोक संस्कृति के प्रति रुचि एवं सम्मान विकसित करने के उद्देश्य से इस प्रकार के आयोजन निरंतर किए जाने चाहिए। उन्होंने प्रशिक्षक राजन तिवारी के मार्गदर्शन की सराहना करते हुए सभी प्रतिभागियों को मन लगाकर सीखने और लोक संगीत की इस अमूल्य परंपरा को आगे बढ़ाने के लिए प्रेरित किया।
यह कार्यशाला 30 जुलाई 2029 तक प्रतिदिन प्रातः 10:00 बजे से संत अतुलानन्द कॉन्वेंट स्कूल, कोइराजपुर, वाराणसी में आयोजित की जाएगी।
आयोजकों ने बताया कि इस कार्यशाला का उद्देश्य उत्तर प्रदेश की समृद्ध लोक-संगीत परंपरा के संरक्षण, संवर्धन तथा नई पीढ़ी को लोक संस्कृति से जोड़ना है।यदि चाहें, मैं इसे समाचार पत्रों की शैली (अमर उजाला, दैनिक जागरण, हिन्दुस्तान आदि में प्रकाशित होने योग्य) में और अधिक आकर्षक बनाकर भी तैयार कर सकता हूँ।

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