उत्तर प्रदेशवाराणसी

काशी ज्ञान के क्षेत्र में बने ऐसा कॉरिडोर, जो पुरातन और आधुनिक ज्ञान को जोड़े, भारतीय भाषा समागम में 19 भाषा विद्वान सम्मानित

Ashutosh pandey

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वाराणसी, 14 सितंबर (हि.स.)। भारत के पुरातन ज्ञान और आधुनिक ज्ञान के बीच एक दीवार खड़ी हो गई है। इस दीवार को तोड़कर दोनों के बीच संवाद का पुल बनाना होगा। भारत को हजारों वर्ष पीछे जाकर बैठने की जरूरत नहीं, बल्कि अपनी प्राचीन ज्ञान परंपरा को वर्तमान विज्ञान, शिक्षा, तकनीक और शोध से जोड़ने की आवश्यकता है। काशी इस टूटे हुए ज्ञान सेतु को फिर से जोड़ने का केंद्र बन सकती है। भौतिक विकास के लिए काशी में कॉरिडोर बने हैं, अब ज्ञान के क्षेत्र में भी ऐसा कॉरिडोर बनाने की जरूरत है। यह बात केंद्रीय विश्वविद्यालय हिमाचल प्रदेश के पूर्व कुलपति एवं भारतीय भाषा समागम के मुख्य अतिथि डॉ. कुलदीप चंद अग्निहोत्री ने रविवार को महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ के गांधी अध्ययन पीठ सभागार में हिन्दुस्थान समाचार की ओर से आयोजित ‘भारतीय ज्ञान परंपरा, क्षेत्रीय भाषाएं और समृद्ध भारत’ विषयक संगोष्ठी में कही। हिन्दी दिवस की पूर्व संध्या पर आयोजित भारतीय भाषा समागम में डॉ. अग्निहोत्री ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा को केवल दर्शन और अध्यात्म तक सीमित करके देखना उचित नहीं है। भारत ने गणित, रसायन विज्ञान, वनस्पति विज्ञान, चिकित्सा और खगोल विज्ञान सहित अनेक क्षेत्रों में महत्वपूर्ण ज्ञान अर्जित किया था। इस ज्ञान को वर्तमान संदर्भों में पुनर्पाठ करने और आधुनिक विज्ञान के साथ जोड़ने की जरूरत है।
उन्होंने कहा कि संस्कृत सहित भारतीय भाषाओं में उपलब्ध पांडुलिपियों और आधुनिक विषयों के विशेषज्ञों के बीच संवाद स्थापित होना चाहिए। यदि प्राचीन ग्रंथों में उपलब्ध ज्ञान का आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टि से अध्ययन किया जाए तो भारतीय ज्ञान परंपरा के अनेक महत्वपूर्ण आयाम सामने आ सकते हैं। इसके लिए पुरातन ज्ञान को संग्रहालयों और पुस्तकों तक सीमित रखने के बजाय शोध, शिक्षा और तकनीक से जोड़ना होगा। अपनी भाषा में बोलने वाले को कमतर समझने की मानसिकता बदलनी होगी’
डॉ. अग्निहोत्री ने भारतीय भाषाओं को ज्ञान-विमर्श के केंद्र में लाने पर जोर देते हुए कहा कि अंग्रेजी में बोलने वाले को विद्वान और अपनी भाषा में बोलने वाले को कमतर समझने की मानसिकता बदलनी होगी। सभी भारतीय भाषाएं ज्ञान और सांस्कृतिक परंपरा की वाहक हैं। भारतीय भाषाओं में मौजूद ज्ञान-संपदा को आधुनिक अकादमिक विमर्श से जोड़ना समय की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि काशी सदियों से ज्ञान, चिंतन और संवाद की भूमि रही है। इसलिए यहां से भारतीय ज्ञान परंपरा और आधुनिक ज्ञान के बीच नए संवाद की शुरुआत की जा सकती है। काशी को इस दिशा में राष्ट्रीय स्तर पर नेतृत्वकारी भूमिका निभानी चाहिए। भारतीय ज्ञान परंपरा शाश्वत ज्ञान के साक्षात्कार की परंपरा : मुकुल कानिटकर
मुख्य वक्ता राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की अखिल भारतीय प्रचार टोली के सदस्य मुकुल कानिटकर ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा किसी नई चीज की निर्मिति नहीं, बल्कि शाश्वत ज्ञान के साक्षात्कार की परंपरा है। विविधता में एकत्व को पहचानना ज्ञान है और उस एक सत्य के विशेष रूप को समझना विज्ञान है।
उन्होंने न्यूटन का उदाहरण देते हुए कहा कि न्यूटन ने गुरुत्वाकर्षण बनाया नहीं, बल्कि प्रकृति में पहले से विद्यमान गुरुत्व का साक्षात्कार किया। उन्होंने कहा कि भारत की सभी भाषाएं केवल क्षेत्रीय नहीं, बल्कि अखिल भारतीय भाषाएं हैं। भाषा बदल सकती है, लेकिन भाव नहीं बदलता। भाषा ‘मैं’ से ‘हम’ की यात्रा का माध्यम है। उन्होंने भारतीय ज्ञान परंपरा को तकनीक से जोड़ने और काशी को इस ज्ञानधारा का महत्वपूर्ण केंद्र बनाने पर जोर दिया।
—काशी सभी भारतीय भाषाओं को देती है साझा सांस्कृतिक भूमि : द्विवेदी
राज्य सूचना आयुक्त पदुम नारायण द्विवेदी ने कहा कि काशी का महत्व केवल भाषाओं तक सीमित नहीं है। भारतीय ज्ञान परंपरा की जड़ें भी यहां बेहद गहरी हैं। यह प्राचीन नगरी सदियों से चिंतन, संवाद और ज्ञान-मंथन का केंद्र रही है। उन्होंने कहा कि दुनिया में शायद ही कोई ऐसा नगर होगा, जहां इतनी भाषाओं के विद्वान एक साथ मिलते हों। अलग-अलग भाषाओं की अपनी समृद्ध परंपराएं हैं, लेकिन काशी उन सभी को एक साझा सांस्कृतिक और ज्ञान की भूमि प्रदान करती है। केंद्रीय उच्च तिब्बती शिक्षा संस्थान, सारनाथ के कुलपति भिक्षु प्रो. (डॉ.) वंगछुग दोर्जे नेगी ने कहा कि भारत की सभी क्षेत्रीय भाषाएं ज्ञान की छोटी-छोटी नदियों की तरह हैं। इनके समागम से भारतीय भाषाएं और अधिक समृद्ध एवं प्रभावशाली बनेंगी। उन्होंने भारतीय ज्ञान परंपरा के मूल भाव को ‘असतो मा सद्गमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय, मृत्योर्मा अमृतं गमय’ में निहित बताया।
प्रदेश के पूर्व मंत्री एवं वाराणसी शहर दक्षिणी के विधायक डॉ. नीलकंठ तिवारी ने कहा कि काशी केवल धार्मिक नगरी नहीं, बल्कि ज्ञान और आध्यात्मिक चिंतन की विश्व की विशिष्ट भूमि है। प्रयाग, अयोध्या और मथुरा भक्ति से जुड़ी धार्मिक नगरियां हैं, लेकिन ज्ञान की प्राप्ति करनी है तो काशी से बेहतर स्थान नहीं हो सकता।
—15 भाषाओं में समाचार उपलब्ध कराती है हिन्दुस्थान समाचार कार्यक्रम की अध्यक्षता हिन्दुस्थान समाचार समूह के अध्यक्ष अरविंद भालचंद्र मार्डीकर ने की। उन्होंने कहा कि हिन्दुस्थान समाचार एक साथ 15 भाषाओं में समाचार उपलब्ध कराने वाली विश्व की एकमात्र बहुभाषी न्यूज एजेंसी है। संस्था की लगभग आठ दशक की यात्रा भारतीय भाषाओं में विश्वसनीय सूचना पहुंचाने की प्रतिबद्धता से जुड़ी रही है। समागम का शुभारंभ डॉ. कुलदीप चंद अग्निहोत्री, मुकुल कानिटकर, केंद्रीय उच्च तिब्बती शिक्षा संस्थान, सारनाथ के कुलपति भिक्षु प्रो. (डॉ.) वंगछुग दोर्जे नेगी, राज्य सूचना आयुक्त पदुम नारायण (पीएन) द्विवेदी और पूर्व पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री डॉ. नीलकंठ तिवारी ने वैदिक मंत्रोच्चार के बीच मां भारती के चित्र पर माल्यार्पण कर किया। मुख्य समन्वयक एवं क्षेत्रीय संपादक डॉ. राजेश तिवारी ने अतिथियों का स्वागत किया। महामना पं. मदनमोहन मालवीय हिंदी पत्रकारिता संस्थान के निदेशक डॉ. नागेंद्र कुमार सिंह की विशेष उपस्थिति रही। संचालन हिन्दुस्थान समाचार के संपादक जितेंद्र तिवारी ने किया। समारोह में विभिन्न भारतीय भाषाओं के 19 भाषा विद्वानों को सम्मानित किया गया। इस अवसर पर ‘युगवार्ता’ और ‘नवोत्थान’ पत्रिकाओं का लोकार्पण भी हुआ।

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