सृजन ही मानव जीवन की प्रगति का आधार है : जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी नरेंद्रानंद सरस्वती

Shekhar pandey
आदि शंकराचार्य महासंस्थानम में वैदिक मंत्रोच्चार के बीच भगवान विश्वकर्मा का पूजन एवं मां भुवनेश्वरी का दिव्य महायज्ञ संपन्न
वाराणसी। पंचकोशी मार्ग स्थित आदि शंकराचार्य महासंस्थानम में देवशिल्पी भगवान विश्वकर्मा महाराज का पूजन-अर्चन वैदिक विधि-विधान एवं मंत्रोच्चार के बीच श्रद्धा और भक्ति के साथ संपन्न हुआ। इसी क्रम में दशमहाविद्याओं में प्रतिष्ठित मां भुवनेश्वरी देवी का दिव्य अनुष्ठान एवं महायज्ञ भी विधिपूर्वक कराया गया। संपूर्ण धार्मिक आयोजन जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी नरेंद्रानंद सरस्वती जी महाराज के सानिध्य एवं मार्गदर्शन में संपन्न हुआ।
वैदिक आचार्यों एवं विद्वान ब्राह्मणों ने भगवान विश्वकर्मा महाराज का षोडशोपचार विधि से पूजन कर वैदिक मंत्रों के साथ हवन एवं आहुति संपन्न कराई। साधु-संतों एवं श्रद्धालुओं ने देवशिल्पी भगवान विश्वकर्मा के चरणों में नमन करते हुए राष्ट्र, समाज एवं समस्त मानवता के कल्याण, सुख-समृद्धि और उन्नति की मंगलकामना की।
इस अवसर पर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी नरेंद्रानंद सरस्वती जी महाराज ने कहा कि सनातन संस्कृति में भगवान विश्वकर्मा केवल निर्माण और शिल्प के देवता ही नहीं, बल्कि सृजन, कौशल, कर्म और रचनात्मक शक्ति के प्रतीक हैं। मानव जीवन को आगे ले जाने वाली शक्ति सृजन की शक्ति है। भारतीय ऋषि परंपरा ने श्रम, साधना, कौशल और कर्म को सदैव सम्मान दिया है।
उन्होंने कहा कि जिस प्रकार शिल्पी अपने कौशल से किसी सामान्य वस्तु को सुंदर और उपयोगी स्वरूप प्रदान करता है, उसी प्रकार मनुष्य भी अपने कर्म, संस्कार और साधना से अपने जीवन को श्रेष्ठ बना सकता है। कर्म में कुशलता, मन में पवित्रता और जीवन में सृजनशीलता ही सनातन जीवन-दृष्टि का संदेश है।
इसके पश्चात महाविद्या मां भुवनेश्वरी देवी का विशेष पूजन एवं महायज्ञ संपन्न कराया गया। वैदिक ऋचाओं, देवी सूक्तों एवं मंत्रोच्चार के मध्य मां भुवनेश्वरी का आवाहन, पूजन, अर्चन एवं हवन किया गया। साधकों और श्रद्धालुओं ने यज्ञाग्नि में आहुतियां समर्पित कर जगत के कल्याण, धर्म की प्रतिष्ठा, समाज में सुख-शांति तथा राष्ट्र की समृद्धि के लिए प्रार्थना की।
जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी नरेंद्रानंद सरस्वती जी महाराज ने कहा कि मां भुवनेश्वरी समस्त चराचर जगत में व्याप्त आदिशक्ति का स्वरूप हैं। सनातन साधना परंपरा में दशमहाविद्याओं का अत्यंत विशिष्ट स्थान है। मां भुवनेश्वरी की उपासना साधक को आध्यात्मिक चेतना, आत्मबल और सकारात्मक ऊर्जा प्रदान करने वाली मानी गई है।
उन्होंने कहा कि आज आवश्यकता है कि सनातन परंपरा के इन दिव्य आध्यात्मिक संदेशों को केवल पूजा-पद्धति तक सीमित न रखकर अपने आचरण और जीवन में भी उतारा जाए। साधना तभी सार्थक है, जब उससे व्यक्ति के भीतर सेवा, सदाचार, करुणा और लोकमंगल की भावना जागृत हो।
पूरे अनुष्ठान के दौरान आश्रम परिसर वैदिक मंत्रों की गूंज, हवन की सुगंध और धार्मिक वातावरण से आध्यात्मिक ऊर्जा से परिपूर्ण रहा। साधु-संतों, आचार्यों एवं श्रद्धालुओं ने पूर्ण श्रद्धाभाव से धार्मिक अनुष्ठानों में सहभागिता की। अंत में आरती, प्रसाद वितरण एवं विश्वकल्याण की मंगलकामना के साथ आयोजन का समापन हुआ।
इस अवसर पर डॉ. विनय मिश्रा, सच्चिदानंद तिवारी, देव नारायण शुक्ल सहित अनेक श्रद्धालु एवं धर्मानुरागी उपस्थित रहे।







