गुरु का चयन पद-प्रतिष्ठा से नहीं, योग्यता और जीवनानुकूल मार्गदर्शन से करें
Shekhar pandey
“गुरु बिनु भवनिधि तरै न कोई।”
संत कबीरदास ने गुरु की महिमा का वर्णन करते हुए कहा है—
“सब धरती कागद करूँ, लेखनी सब बनराय।
सात समुद्र की मसि करूँ, गुरु गुण लिखा न जाय।।”
अर्थात यदि संपूर्ण पृथ्वी को कागज़, सभी वनस्पतियों को लेखनी और सातों समुद्रों के जल को स्याही बना दिया जाए, तब भी गुरु के गुणों और उनके उपकार का पूर्ण वर्णन नहीं किया जा सकता। गुरु का ज्ञान, करुणा और कृपा अनंत है।
मनुष्य के जीवन में प्रथम गुरु उसकी माता होती है, जो उसे जीवन के प्रारम्भिक संस्कार देती है। द्वितीय गुरु पिता होते हैं, जो जीवन की दिशा और अनुशासन सिखाते हैं। यज्ञोपवीत संस्कार के समय दीक्षा देने वाले आचार्य तथा विद्यालय या गुरुकुल में शिक्षा देने वाले शिक्षक भी गुरु के रूप में सम्मानित होते हैं।
वेद प्रकाश मिश्र ‘कलाधर’
“तुमने बताया जग में उँगली पकड़ के चलना,
तुमने बताया कैसे गिरकर पुनः संभलना।
तुमने करी कृपा तो मैं पहुँचा इस मुकाम पर,
वरना पता न चलता यह जन्म क्यों मिला था।”
भारतीय संस्कृति में गुरु पूर्णिमा, गुरु दीक्षा और गुरु दक्षिणा केवल परम्पराएँ नहीं हैं, बल्कि गुरु और शिष्य के मध्य स्थापित होने वाले पवित्र एवं आध्यात्मिक संबंध के आधार स्तंभ हैं।
गुरु दीक्षा का महत्व
गुरु दीक्षा वह प्रक्रिया है जिसमें योग्य गुरु अपने शिष्य को आध्यात्मिक ज्ञान, मार्गदर्शन और साधना का मार्ग प्रदान करते हैं। आध्यात्मिक यात्रा का वास्तविक आरम्भ गुरु कृपा से ही माना गया है।
गुरु कृपा के चार स्वरूप
1. स्मरण से
जैसे कछुआ जल में रहते हुए भी अपने अंडों का स्मरण करता है और वे विकसित हो जाते हैं, उसी प्रकार गुरु का स्मरण भी शिष्य के भीतर ज्ञान का प्रकाश उत्पन्न करता है। इसे स्मरण दीक्षा कहा गया है।
2. दृष्टि से
जैसे मछली अपने अंडों पर दृष्टि रखती है और वे विकसित होते हैं, वैसे ही गुरु की कृपा-दृष्टि शिष्य के जीवन में चेतना का संचार करती है। इसे दृष्टि दीक्षा कहते हैं।
3. शब्द से
गुरु अपने उपदेश, वाणी और ज्ञान के माध्यम से शिष्य का अज्ञान दूर करते हैं। यह शब्द दीक्षा कहलाती है।
4. स्पर्श से
गुरु के पावन स्पर्श से भी शिष्य के भीतर आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार होता है। इसे स्पर्श दीक्षा कहा जाता है।
शास्त्रों में कहा गया है—
“अज्ञानतिमिरान्धस्य ज्ञानाञ्जनशलाकया।
चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः।।”
अर्थात जिन्होंने अज्ञान रूपी अंधकार से ढकी आँखों को ज्ञान रूपी अंजन से खोल दिया, उन श्रीगुरुदेव को बार-बार प्रणाम है।
गुरु का कार्य केवल शिक्षा देना नहीं, बल्कि शिष्य के भीतर की अज्ञानता, भ्रम और विकारों को दूर कर उसे सत्य, विवेक और आत्मबोध के मार्ग पर अग्रसर करना है।
गुरु-शिष्य संबंध
दीक्षा के पश्चात गुरु और शिष्य के बीच आत्मिक संबंध स्थापित होता है। गुरु अपने शिष्य को आध्यात्मिक उन्नति की दिशा देते हैं और शिष्य श्रद्धा, अनुशासन तथा समर्पण के साथ उस मार्ग पर चलता है। इस संबंध की नींव विश्वास, मर्यादा और साधना पर आधारित होती है।
गुरु का चयन कैसे करें?
वर्तमान समय में अनेक लोग स्वयं को गुरु के रूप में प्रस्तुत करते हैं। इसलिए आवश्यक है कि गुरु का चयन केवल उनके पद, प्रसिद्धि, वेशभूषा या प्रतिष्ठा देखकर न किया जाए, बल्कि उनके ज्ञान, आचरण, चरित्र, अनुभव और जीवन-मार्गदर्शन की क्षमता को समझकर किया जाए।
गृहस्थ जीवन जीने वाले व्यक्ति के लिए ऐसा गुरु अधिक उपयोगी हो सकता है जो गृहस्थ जीवन की जिम्मेदारियों, संघर्षों और व्यवहारिक पक्ष को समझता हो। वहीं, जो व्यक्ति पूर्णतः वैराग्य और संन्यास के मार्ग पर अग्रसर है, उसके लिए संन्यासी गुरु उपयुक्त हो सकते हैं।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि गुरु वही होना चाहिए जो शिष्य के जीवन, स्वभाव, साधना और उद्देश्य के अनुरूप सही मार्गदर्शन दे सके। केवल किसी की प्रसिद्धि या ऊँचे पद को देखकर गुरु बनाना उचित नहीं माना गया है। गुरु का चयन विवेक, श्रद्धा और विचारपूर्वक करना चाहिए।
जब योग्य गुरु का सान्निध्य प्राप्त होता है, तब जीवन में आत्मविश्वास, शांति, स्थिरता और सही दिशा का उदय होता है। ऐसा गुरु ही शिष्य को सांसारिक कर्तव्यों का संतुलन बनाए रखते हुए आध्यात्मिक उन्नति की ओर ले जा सकता है।
तस्मै श्री गुरवे नमः।







